Tuesday, April 28, 2020

कीमत चुकाने का आविष्कार.....₹ पैसा


पैसा जिसको शायद सब जानते हैं जो पैदा हो रहे वो भी मम्मी पापा को जानने से पहले इस पैसे को जानने लगते हैं।

ये जो हल्की सी मुस्कान आपके होठों पर अभी आयी, ये असली है। जिसकी शायद कोई कीमत नहीं होती या यू कहे की ये अमूल्य हैं। 

इस अमूल्य शब्द कि ही कीमत आज हम लगाने लगे हैं ये जानते हुए कि कुछ चीजों की कीमत नहीं होती।
तो आगे बढ़ते है और जानते है कौन है जो हर चीज की कीमत लगाने और उसको नापने कि कोशिश के कीड़े को हमारे दिमाग में पनपने देता है। 


पैसे का आविष्कार मनुष्य की बड़ी खोजो में से एक हैं। जिसका आविष्कार वस्तु विनिमय को सरल बनाने के लिए किया गया था। जिससे किसी भी वस्तु का मूल्य बहुत आसानी से चुका कर वस्तु खरीदी जा सकती हैं। बहुत सुंदर और बहुत ही कमाल का आविष्कार •••सब काम आसान हो गया। पैसा है आपके पास तो कीमत चुकाइए वस्तु आपकी उसका उपभोग कीजिए। इस तरह जीस पैसे का आविष्कार वस्तु की कीमत चुकाने के लिए किया गया था आज उसी पैसे कि कीमत उसको बनाने वाले से ज्यादा हो चुकी है। आज पैसे से वस्तु कि कीमत के साथ साथ शायद  एहसान कि कीमत भी चुकाई जा सकती है। और ये शायद •••शायद नहीं हकीकत है। 

एक ऐसी मशीन जो इंसान की औकात, हैसियत, या उसकी इज्जत कितनी करनी है या करनी ही नहीं है ये सब बताने में सक्षम हैं, जीसका नाम पैसा है। जात- पात का भेद भाव  शिक्षा से शायद खत्म ना हो पाया, वो काम पैसे ने आराम से कर दिया। चलो कुछ तो अच्छा काम किया इस पैसे ने•••

लेकिन ये पैसा इंसान की इंसानियत को ऐसे ख़तम कर रहा है जैसे दीमक लकड़ी को धीरे धीरे खाता रहता है और उसे अंदर से खोखला बना देता है। बहुत पहले लोगो में एक व्यवहार हुआ करता था, जिसमें इंसान कुछ के बदले थोड़ा ज्यादा दे कर खुश होता था।  जो आज भी है लेकिन शायद उतना नहीं••• अब जो व्यवहार है उसको एहसान बोलते है।उसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है, और जो आज पैसे से बहुत आराम से हो जा रहा।

एक निबंध याद आ रहा है - विज्ञान वरदान या अभिशाप ।
मुझे लगता है विज्ञान नहीं उसके द्वारा कि हुई आविष्कार वरदान या अभिशाप होती है।

एक निबंध इस पर भी होना चाहिए - पैसा वरदान या अभिशाप।

और जब इस निबंध को बच्चे पढ़ेंगे तो उनको ये समझने में आसानी होगी कि पैसे का इस्तेमाल हमे कैसे करना है और इसका मकसद क्या है और कितना है, नहीं तो ये अभिशाप हमारे भविष्य को निगल जाएगा।

हम उम्र में छोटे या बड़े है, अब ये बताने का काम भी पैसा करता है। पैसे वाले हैं तो बड़े नहीं तो छोटे। अगर हम रिक्शे से कहीं जा रहे और वो रिक्शा कोई हमसे उम्र में बड़ा व्यक्ति चला रहा हो तो, वहां पर ऐसी स्तिथि में पीछे बैठने वाला व्यक्ति पैसे वाला है तो, वो चाहे किसी भी उम्र का हो उस रिक्शे वाले से बड़ा ही होगा ये पैसा बतलाता है।

इंसान और उसकी इंसानियत को नापने वाला तराजू रूपी पैसा आज अपने जन्मदाता से बड़ा हो गया है। आज उसको ही अपनी अकड़ दिखा रहा है और ये बोल रहा है जो मै नहीं, तो तु कुछ भी नहीं है।

ऊपर मैंने व्यवहार कि बात की थी जिसमें जब लोग किसी को कुछ देते थे तो कुछ से ज्यादा देकर खुश होते थे और पाने वाला भी। और आज अगर आप कोई वस्तु खरीदते है तो उसकी कीमत चुका दिया। जिससे ना कोई व्याहार बना और ना कोई खुशी मिली बस एक विनिमय हो गया। और कोई व्यहार बनाना भी क्यों है पैसा दिया वस्तु ली काम ख़तम ••• और इतना समय भी तो नहीं है आज के समय में। आज सब कुछ खरीद सकते है इस पैसे से लेकिन इस बिजी समय का एक पल भी नहीं खरीद सकते और ना ही खुशियों के कोई एक पल जैसे - किसी का प्यार, मां की ममता, अपनी हसी और भी बहुत कुछ जो इस पैसे को हम बताना नहीं चाहते या शायद खुद को ••• फिर भी हम इस पैसे को महत्व दे रहे क्यों की हमने इसको महत्वपूर्ण बना दिया है और अपना जीवन इसके आधीन कर दिया है, और भूल गए हैं खुल के जीना, लगे हुए हैं एक अंधी दौड़ में जिसमें हम किसी को अपने आगे नहीं पहचानना चाहते। 

मै ये नहीं कहता कि पैसा कमाना छोड़ दिया जाए। मगर इसका उपयोग इसकी उपयोगिता कि औकात से अधिक इसको महत्व नहीं देना चाहिए। जिससे ये हमें ही हमारी औकात बताने का एक मशीन बन जाए।